प्रकृति पंचभूता है, अर्थात् पंचतत्वो से, बनी है | यह समस्त ब्रह्माण्ड भी कमोबेस इन्ही तत्वों से, निर्मित है | मनुष्य पंचतत्वो की साकृति है | मानव प्रकृति की ऐसी अदभुत् रचना है, जिसका निर्माण ब्रह्माण्ड विजय के निमित्त हुआ है | पंचस-मानव की पंच-मूल आवश्यकताएं है, जिनकी पूर्ति मात्र से, प्रत्येक मनुष्य, स्वयं पंचेश्वर बन ब्रह्माण्ड सत्ता को स्थापित करेगा | परन्तु चन्द सत्ता लोलुप तुच्छ-स्वार्थ परक लोगो ने कालांतर से, अबतक मानव की आवश्यकताओं से, शतरंज के खेल की तरह खेला है, नित्य मानवता का स्खलन कर इसे ईश्वर बनाने की जगह मानव पशु में, परिवर्तित कर दिया | सम्पूर्ण विश्व में, राजतंत्र का दूसरा घृणित चेहरा, अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र के माध्यम से, विश्व अर्थ का 95% भाग अवशोषित कर, एक छोटे से, भूभाग स्विट्जरर्लैंड जिसे की, प्रत्यक्ष प्रजातंत्र प्रदान किया गया है, इसके बैंको में, काले धन के रूप में, जमा कर दिया गया है | इस प्रकार से, सत्तावादी मानवों ने, स्विट्जरर्लैंड में, काले धन का ब्लैक होल बना कर, विश्व भर के मानवों से, अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र के दृारा 95% धन शोषित कर, मानव को मानव-पशु,तथा मानव सभ्यता को माया सभ्यता में, परिवर्तित कर दिया है | माया शब्द का अर्थ भ्रम होता है, मानव निर्मित समस्त प्रसाधन मानव से, आगे है, स्वयं मनुष्य सबसे पीछे खड़ा खुद को सबसे कम कीमत पर बेचने को विवश है | मनुष्य की मात्र पांच आवश्यकताओं की अगर पूर्ति हो जाय तो, मनुष्य स्वयं पंचेश्वर बनकर ब्रह्माण्ड सत्ता का सञ्चालन करेगा | और मानव सभ्यता, जो की माया सभ्यता, में, परिवर्तित हो चुकी है, इससे निजात मिलेगी | और मानव ब्रह्माण्ड विजय की और निकल पड़ेगा |

 

मात्र 5000 रूपए अगर प्रत्येक मनुष्य को मिले तो वह अपना पोषण पूर्ण कर सकता है | क्यूंकि अधिकतम अपराध की जननी भूख है, जब तक मानव भूख पे, विजय नहीं पा लेता, तब तक समाज के हर तबके से, अपराध को नहीं मिटाया जा सकता | इस सत्य को नाकारा नहीं जा सकता | विश्व के प्रत्येक देशों में, प्रत्येक वर्ष, रक्षा बजट के नाम पर विशाल धन राशि, बारूद के नाम पर गलत खर्च किये जाते हैं | इस विध्वंशकारी बजट का एक छोटा अंश मात्र ही मानव पोषण हेतु प्रयाप्त होगा | अगर मानव सुपोषित होगा तो मानव बम बनने की जगह समाज को एक बेहतर भविष्य देगा | विश्व मानव समाज से, प्रत्येक अतिवाद का स्वयं ही अंत हो जायेगा | सकल मानव समाज मानवीय हो जायेगा | फिर किसी व्यक्ति विशेष को किसी व्यक्ति विशेष से, भयभीत होने की और किसी से, शोषित होने की आवश्यकता नहीं होगी | इससे एक भयमुक्त समाज, शोषण मुक्त समाज, की स्थापना होगी | फिर सुरक्षा के नाम पर बारूद की आवश्यकता नहीं होगी | समाज एक नई दिशा, और दशा तय करेगा | मनुष्य पूर्ण रूप से, विकसित होगा, समाज स्वतः रूप से, उन्नत होगा, और एक नए विश्व की रचना करेगा | घुटनों के बल रेंगने वाला मानव ब्रह्माण्ड की तरफ अग्रसर होगा | और समाज से, प्रत्येक तरह की विकृति दूर हो जाएगी | मनुष्य, मनुष्य से, घृणा की जगह परस्पर प्रेम करने लगेगा | क्योंकि इस धरती पर सबसे हिंसक प्राणी, शेर भी जब भूख से, पड़े होता है तो वह शिकार नहीं करता है, जिसमे विवेक नहीं होता है | और मानव जो की जन्म से, ही विवेकशील प्राणी है, वह अगर भूख से, पड़े होगा तो विध्वंशक कार्यो की जगह रचनात्मक कार्यो में, विश्वास करेगा और समाज को सही दिशा निर्देश देगा | इससे एक स्वस्थ समाज, देश और विश्व का नवनिर्माण होगा |

विकास करने का हक़ प्रत्येक मनुष्य को है | समानता का अधिकार, आर्थिक समानता से, ही संभव है | जब तक प्रत्येक मानव शिक्षित नहीं होगा वह अपने अधिकार के ज्ञान से वंचित रहेगा | इसलिए प्रत्येक मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार होता है शिक्षा प्राप्त करना | प्राथमिक विद्यालय से विश्वविद्यालय तक निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था हो और किसान जो कि अन्नदाता है उसे उसके उत्पादन मूल्य का दुगना लाभ न्यूनतम प्राप्त हो क्योकि जीवन का आधार ही किसान है विचारणीय है कि आज विश्व मानव के किसी भी वर्ग या तबके में, विकास दिखाई नहीं देता, क्योंकि परिश्रमिक के रूप में, जो दिया जाता रहा है, वह महज भीख है, अधिकार नहीं | और जबतक मानव अर्थ के अधिकार से, वंचित है, विकास असंभव है | विकास तभी संभव है, जब प्रत्येक मनुष्य को उसका आर्थिक हक़ मिले | अब प्रश्न उठता है, की आखिर आर्थिक हक़ है, क्या ? किसी भी संस्थान को एक रूपया भी, अगर मुनाफा होता है, तो उसमे श्रम करने वाले श्रमिक, पूंजी लगाने वाले पूंजीपति, और व्यवस्था चलानेवाले व्यवस्थापक (सरकार), का हक़ होता है | आजतक विश्व भर में, जो एक रूपया मूल मुनाफा होता आया है, उसे पूंजीपति और सरकार आपस में, बाँट लेते है | और श्रमिक को वेतन के रूप में, महज भीख दी जाती है | जिससे उनका विकास संभव नहीं हो सकता | अब प्रश्न उठता है, श्रमिक का विकास कैसे संभव हो ? विश्व अर्थव्यवस्था में, एक गलत अवधारणा है, की पैसा से, पैसा बनता है, जबकि बगैर मानव के श्रम से, एक रूपए की भी उत्पत्ति नहीं हो सकती | तो एक रूपया जो, मूल मुनाफा होता है, उसमे पहला हक़ श्रमिको का होता है | वेतन भले ही पद के हिसाब से, दिया जाय, लेकिन लाभांश में, सबों का हक़, सामान होना चाहिए | जो मूल मुनाफा एक रूपया होता है, उसका बंटवारा इस प्रकार होना चाहिए, 40 पैसा श्रमिको का, 30 पैसा पूंजीपतियों का, और 30 पैसा सरकार का, होना चाहिए | श्रमिको को जो 40 पैसा मिले, उसका सामान रूप से, श्रमिको में, बंटवारा हो | चाहे वह संसथान सरकारी हो या गैर सरकारी, इससे समाज के हर तबके को, विकास करने का सामान रूप से, अवसर प्रदान होगा | इसका एक दूरगामी परिणाम होगा, विश्व भर मैं आर्थिक क्रांति आ जाएगी, और उत्पादन कई गुना बढ़ जायेगा, गरीब, गरीब नहीं रहेगा और आमिर, और आमिर हो जाएँगे | क्योंकि जो पैसा श्रमिको को मिलेगा, उससे वह अपनी भौतिक सुख, सुविधाएँ, जिससे की, वह वंचित रह जाता है, उसकी वह पूर्ति करेगा, और पैसा पुनः बाज़ार को प्राप्त होगा | जिससे समाज के हर तबके में, विकास की, किरण अपने आप पहुँच जाएगी | समानता का नारा जो, आज तक विश्व भर में, लोग लगाते आयें हैं, वह सपना साकार होगा | आज विश्व भर में, आर्थिक मंदी, शब्द का उद्घोष हो रहा है | पर जरा गौर से, सोचे, और आखें खोल कर देखे तो, पाएंगे की इस विश्व आर्थिक मंदी में, तमाम सामान्य व मझौले व्यवसायी ख़त्म हो गए, उनका नामो निशान मिट गया, वो रास्ते पर आगये | बहुत मेहनत से, पीढी दर पीढी विकास कर, जो मनुष्य खुशहाली के स्तर तक पहुंचा था, वह सम्पूर्ण रूप से, बर्बाद हो गया | इसके ठीक विपरीत व्यवसाय के उच्च वर्ग पे, इस आर्थिक मंदी का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं दिखाई दिया | इसका एक ही अर्थ निकलता है, बड़े व्यवसायी और सत्ताशाहों ने मिल कर, आर्थिक मंदी का प्रपंच गढ़कर सामान्य और मझौले स्तर के व्यवसायिओं के उपर मढ़ दिया | जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है | आज विश्व आर्थिक मंदी से, जूझ रहा है, और लोग आत्महत्या करने को मजबूर हैं | लोग सही दिशा की जगह, गलत दिशा की और अग्रसर हो रहे हैं | जिसका एक गंभीर दुष्परिणाम सामने दिखाई दे रहा है | समाज के हर तबके में, आक्रोश दिखाई दे रहा है | मानव, मानव न हो कर मानव, पशु के रूप में, परिवर्तित हो रहा है | मानव का वास्तविक विकास, रचनात्मक रूप में, ही सर्वोत्तम होता है | इसका उदाहरण विश्व के एक छोटे से, भू-भाग जापान के रूप में, पूरा विश्व देख रहा है | एक छोटा सा देश, बगैर कोई विद्ध्वंशक हथियार, बनाये, सिर्फ अपनी तकनीकी गुणवत्ता और रचनात्मक क्षमता के कारण, आर्थिक दृष्टिकोण से, विश्व की आर्थिक व्यवस्था में, दूसरा स्थान रखता है | परंतु पूरा विश्व एक छोटे से, देश, जापान से, शिक्षा न ले कर, बारूद बनाने की और द्रुतगति से, सदियों से, लगा हुआ है | सत्तावर्ग विकास की जगह, विनाश की राह पर, विश्वव्यवस्था को चलने पर, मजबूर करता आया है | आखिर मनुष्य को विकास चाहिए, या विनाश ?

वर्त्तमान, विश्व में, आज जो शासन की व्यवस्था है, वह पार्टी के माध्यम से, अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र के रूप में, विकसित है, जो की राजतंत्र का एक घिनौंना प्रारूप है | यह प्रजातंत्र का भ्रम है, प्रजातंत्र के नाम पर धोखा है | प्रजातंत्र का अर्थ होता है – प्रजा पहले बाद में तंत्र | परन्तु पार्टी-तंत्र में – मानव हित, देश हित, सर्वहित से परे पार्टी हित ही सर्वोपरी होता है | अत: प्रजातंत्र की बहाली के लिए, पार्टी-तंत्र का सम्पूर्ण रूप से निष्कासन अति आवश्यक है | एक विकसित पार्टी को एक बार चुनावी प्रक्रिया में, हजारो करोड़ रूपए की आवश्यकता होती है | जिसकी उगाही वह सरकार चलाने से, लेकर, पार्टी की चुनावी टिकट बेच कर करती है, और सत्ता की बागडोर अयोग्य लोगो के हाथो में, थमा देती है | जिसका परिणाम, यह होता है की किसी भी देश में, भुखमरी, गरीबी, अराजकता के रूप में, एक गंभीर समस्या उत्पन्न होती है, और लोगो का विश्वास उस सम्पूर्ण व्यवस्था से, उठ जाता है, और इससे देश में, अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती है, और मानवता हर कदम पे दम तोडती है, जिससे पूरा विश्व रूबरू है | अब प्रश्न उठता है की इस अव्यवस्था का हल क्या हो ? प्रत्यक्ष प्रजातंत्र ही इस अव्यवस्था का एक मात्र समुचित मार्ग हो सकता है, अगर समाज अपने बीच से, बगैर पार्टी के किसी भी व्यक्ति को, जो की सामाजिक व्यवस्था में, पूर्ण विश्वास रखता हो, निर्वाचित कर संसद भवन में, भेजे तभी इस लूट तंत्र में, लोकतंत्र के स्थापना की, कल्पना की जा सकती है | पूरे विश्व में, अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र कायम है, और इसी धरती के एक छोटे से, हिस्से को जिसे की धरती का स्वर्ग कहा जाता है, ‘ स्विट्जरर्लैंड ‘, वहां प्रत्यक्ष प्रजातंत्र बहाल है | जिसका परिणाम पूरा विश्व देख रहा है | स्विट्जरर्लैंड, जो की काले धन का बड़ा मंडी है, और वहां प्रत्यक्ष प्रजातंत्र बहाल है | अगर पूरे विश्व की सत्ता सञ्चालन की व्यवस्था, उसी काले धन के काले समूह के दृारा नहीं होता, तो पूरे विश्व के काले धन का मालिक स्विट्जरर्लैंड नहीं होता | अगर पूरा विश्व प्रत्यक्ष प्रजातंत्र के व्यवस्था को अपना ले, तो काले धन का यह खेल हमेशा, हमेशा के लिए समाप्त हो जायेगा | जिसका परिणाम यह होगा की पूरा विश्व एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में, उभर कर सामने आएगा | और विश्व से, हमेशा, हमेशा के लिए अर्थ-विपन्नता समाप्त हो जाएगी | क्योंकि पूरे विश्व में, जो आज अराजकता फैली हुई है, वह अर्थ के लिए ही है | क्योंकि पैसे का निर्माण मनुष्य ने अपने आप को सामाजिक व्यवस्था में, कायम करने के लिए किया था, लेकिन कुछ लोगो के सत्ता लोलुपता के कारण, पैसा खुदा बन बैठा | और मुट्ठी भर लोग खुदा की श्रेणी में, काबिज़ हो गए | अगर मुट्ठी भर लोगो के हाथो से, इस विश्व को बचाना है, तो प्रत्यक्ष प्रजातंत्र एक मात्र इस समस्या का समाधान है | साहस का दूसरा रूप आजादी है, इसकी सीख हमे वियतनाम से, लेनी चाहिए, जो की अमेरिका जैसे सुपर पावर से, बरसो लड़ता रहा और वह आज भी आजाद है | इसलिए अगर कोई भी पार्टी हमे आजादी के नाम पर भयभीत करती है, तो उसे वियतनाम जैसे छोटे से, मुल्क से, सीख लेनी चाहिए | आजादी इन्सान का जन्मसिद्ध अधिकार होता है, आजादी किसी की कोई छीन नहीं सकता | हर मनुष्य को पूरी आजादी मिलनी चाहिए, जो की प्रत्यक्ष प्रजातंत्र के दृारा ही संभव है | आज पूरा विश्व राजनीतिक भ्रष्टाचार से, अवगत है और सही राह किसी को दिखाई नहीं देता | क्योंकि प्रत्यक्ष प्रजातंत्र ही इस समस्या का एक मात्र हल है, जिसे यह सत्ताशाह लागू नहीं करना चाहते | और लोगो को गलत राह पे, चलने को मजबूर करते हैं | अगर कोई आवाज इन सत्तासाहों के खिलाफ उठती है, तो उसे वह हमेशा, हमेशा के लिए मिटा देतें हैं | आज का विश्व शिक्षित है, और उसे यह समझना होगा, की पार्टीतंत्र के दृारा सही लोकतंत्र की स्थापना नहीं की जा सकती | सही लोकतंत्र की स्थापना प्रत्यक्ष प्रजातंत्र के माध्यम से, ही संभव है | अगर विश्व आज के युग में, नहीं जगा तो, यह मुट्ठी भर सत्ताशाहों अपनी सत्तालोलुपता के कारण, इस विश्व का सर्वनाश कर देंगे | और माया सभ्यता कभी भी, मानव सभ्यता में, परिवर्तित नहीं हो पायेगा |

मनुष्य को उत्पन्न हुए इस धरती पर 40 लाख वर्ष हो चुके हैं | अब सवाल यह उठता है की, पहले धर्म की उत्पत्ति हुई, या मानव की ? तो इसका सीधा सा और सरल जवाब है ‘ मनुष्य ‘ | धर्म की स्थापना मनुष्य के दृारा समय, समय पर अपनी सुविधा के अनुसार की गई | जब की सबसे बड़ा सच यह है, की मनुष्य के आने और जाने का रास्ता एक ही है, यह धरती एक है , सूर्य एक है, वायुमंडल एक है | जबकि भौगोलिक कारणवश, मनुष्य की अलग अलग भाषाएँ, अलग अलग रंग, अलग अलग खान पान, अलग अलग वेश-भूषाएँ है | कालांतर से, धर्म, सत्ता पक्ष का एक धारदार हथियार बना रहा है | सबसे अधिक रक्त पात, धर्म के नाम पर विश्व भर में, होता रहा है | जिससे की पूरा विश्व आज वाकिफ है | मानव शिशु जब जन्म लेता है, तो वह परमात्मा का रूप होता है, उसे समाज अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार धर्म से, जोड़ देता है | जब की शिशु जब जन्म लेता है, तो उसे यह नहीं पता होता है, की वह किस धर्म का है | समाज उसे जिस धर्म के बारे में, बताता है, वह उसे ही अपना धर्म मान लेता है | एक सम्पूर्ण मानव बनने के लिए, अगर हम सारे धर्मो को एक साथ जोड़ कर देखे, तो मानव धर्म सबसे बड़ा धर्म होता है, क्योंकि धर्म की स्थापना मनुष्य को समाज से, जोड़ने, और सामाजिक व्यवस्था कायम करने के लिए हुई है | बेशक आप जिस धर्म को भी मानते हो, उसमे पूर्ण आस्था रखे, पर मानव और मानवता को पहला स्थान दे | पांच तत्वों से, इस पृथ्वी की रचना हुई है, और इन्ही पांच तत्वों से, मनुष्य का भी निर्माण हुआ है | सभी धर्मो को अगर हम आपस में, जोड़ कर देखे, तो एक सम्पूर्ण मानव और मानवता का निर्माण होता है | उदाहरण स्वरुप : बाइबल, यह बतलाता है की ” पृथ्वी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का केंद्र है, और मानव ब्रह्माण्ड विजय के लिए ही उत्पन्न हुआ है, मानव इस ब्रह्माण्ड का राजा है, और उसकी उत्पति इस ब्रह्माण्ड पर शासन करने के लिए हुई है ” | कुरान शरीफ, यह सिखलाता है की ” मनुष्य का ईमान मुसल्लम होना चाहिए, अर्थात् मनुष्य को अल्लाह, ईश्वर, गौड में, जो की एक ही है, सम्पूर्ण विश्वास होना चाहिए | बिना सम्पूर्ण विश्वास के कुछ भी नहीं पा सकते, और पूर्ण विश्वास से, सब कुछ पाया जा सकता है” | बौध त्रिपिटक समझाता है ” जीवन में, संतुलन का कितना महत्व है | हमे अपने जीवन में, समता को अपनाना चाहिए | धैर्य और संतुलन से, मानव के प्रत्येक दुखो का नाश हो सकता है ” | भागवतगीता यह कहती है की “ईश्वर मानव के अंदर ही समाहित है, अर्थात् मनुष्य ही सच्चे अर्थो में, ईश्वर है | मानव जीवन में, कर्म का स्थान सर्वोपरि है | क्योंकि जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते है, यानि की कर्म महान है ” | प्रत्येक मानव अपने अपने कर्म को पहचाने | इस तरह अगर हम सारे धर्मो को भी आपस में, जोड़ कर देखते हैं, तो मानव धर्म सर्वोपरि धर्म बनता है | मानव धर्म कहता है की चलो यारो किसी मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में, जाने से, अच्छा है, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाए | सही अर्थो में, बच्चा परमात्मा का रूप होता है | हर मानव बाला अवस्था से ही युवा और प्रौढ़ा अवस्था में जीवन का सफ़र तय करता है | जितना रूपया हम धर्म के नाम पर धार्मिक स्थल के उपर खर्च कर देते है, उन्ही रुपयों से अगर हम अपने आसपास के किसी गरीब, और असहाय मजबूर इन्सान की मदद कर के देखे, तो हम खुद में, खुदा का अस्तित्व महसूस करेंगे | इसलिए मानव धर्म सर्वोपरी है | आज पूरा विश्व वाकिफ है भारत, पाकिस्तान, और बंगलादेश की समस्याओं से, | 20 करोड़ मुसलमान हिंदुस्तान में, और लगभग 20 करोड़ मुसलमान पाकिस्तान और बंगलादेश में, रहतें हैं, और रोज एक दूसरे से, लड़ते हैं | जब की इसके राजनीतिक नेता गण अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए रोज एक दूसरे को लड़वाते हैं, और वह खुद आपस में, सुरक्षित रहते हैं | जरा गौर से, सोचे की यह नेता गण आपस में, सुरक्षित रह सकतें हैं, तो क्या आम लोगो का हक़ नहीं बनता है, आपस में, सुरक्षित रहने का | जब की कालांतर में, भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश एक ही मुल्क हुआ करता था | जिसे मुट्ठी भर राजनेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए टुकडो में, बाँट दिया | अगर आज ये तीनो मुल्क एक हो, जाय तो विकास की सबसे ऊँची शिखर पर अपना परचम लहरा सकता है | उदाहरण स्वरुप : पूर्वी और पश्चमी जर्मनी का एकीकरण सामने है | एकता सबसे बड़ी ताकत है, अगर पूरा विश्व एक हो जाय, तो इस ब्रह्माण्ड पर विजय पाना बहुत ही आसान है | एक दशक काफी है, ब्रह्माण्ड विजेता बनने में |

इस प्रकृति के दृारा ही समूचे ब्रह्माण्ड की रचना की गई है | प्रकृति का मूल अर्थ यह ब्रह्माण्ड है | इस ब्रह्माण्ड के एक छोटे से, टुकड़े के रूप में, इस पृथ्वी का अस्तित्व है, जिस पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है | इस पृथ्वी के बगैर मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है, इसलिए मनुष्य का पहला कर्तव्य होता है, इस धरती की रक्षा करना, जबकि मानव सबसे अधिक दोहन इसी पृथ्वी का करते हैं | उदाहरण स्वरुप : परमाणु, जैविक, रासयिनिक और अनेक प्रकार के बारूदो का प्रयोग इसी पृथ्वी पर करते हैं, और अपने आप को इस धरती का शासक कहलाना पसंद करते हैं | जब की यह शासक वर्ग इस धरती का सबसे बड़ा शोषक वर्ग है | जब की पूरा विश्व वाकिफ है, आज के ‘ ग्लोबल वार्मिंग ‘ से, | जरा सोंच कर देखे, की यह धरती एक है, ओजोन लेयर एक है, वायुमंडल एक है, हम कही भी इस पृथ्वी को दूषित करतें हैं, तो उसका प्रभाव समूचे विश्व पर पड़ता है, थोडा पहले या बाद में, | अब दूसरा रूप है, प्रकृति का ‘ नारी ‘ | नारी के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि बच्चा जन्म से, पहले 9 महीने माँ की कोख में, पलता है, और बच्चा जब जन्म लेता है, तो अपनी पहली भूख माँ की छाती से, दूध पी कर मिटाता है | वही बच्चा जब बड़ा होता है, तो जवानी में, नारी से, वासना की भूख मिटाता है, और जब वह प्रौढ़ा अवस्था में, जब असहाय हो जाता है, तो बहू या बेटी के रूप में, स्त्री पर आश्रित हो जाता है | इसका अर्थ यह हुआ की मनुष्य का जीवन, प्रकृति (स्त्री) के बगैर संभव नहीं है, इसलिए हर मनुष्य का पहला कर्तव्य होता है, की वह स्त्री की इज्जत करे, उसकी रक्षा करे, और उससे मिलने वाली खुशियों का आदर करे | जब की इसके ठीक विपरीत आज तक स्त्री और प्रकृति के साथ, अन्याय होता आ रहा है | जब तक हम स्त्री और प्रकृति का सम्मान नहीं करेंगे, हमे खुशियाँ प्राप्त नहीं हो सकती | हमे समझना होगा की जीवन का सही रूप स्त्री और प्रकृति ही है | बगैर स्त्री के सहयोग से पुरुष पूर्ण नहीं हो सकता | मनुष्य को अपने बचपन में, झांक कर देखना होगा की , अपने परिवेश और समाज से, उसे क्या मिला, और आने वाली पीढ़ी को, वो क्या देने जा रहा हैं | पुरुष वर्ग यह समझें की नारी सिर्फ भोग का विषय नहीं, अपितु हर हाल में गौरव का विषय हैं, नारी मन का सम्पूर्ण सम्मान और सहयोग पाने के लिए पुरुषों को पुरुषार्थ प्राप्त करने की आवश्यकता है | पुरुषार्थ दंभ और अहंकार से परे का साहस होता है, जो पुरुषों को पुरुषोचित् व्यक्तित्व प्रदान करता है | बिना चरित्र निर्माण के, पुरुष नारी के सम्मान के, योग्य नहीं हो सकते | पुरुष अपने पुरुषार्थ के बल पे, नारी और प्रकृति दोनों की, रक्षा कर सकता है, बशर्ते पुरुष अपने, पुरुषार्थ को पहचाने | मै, विश्व मानव जागरण मंच के दृारा प्रश्न करना चाहता हूँ, विश्व के तमाम सत्ताशाहो से, की अगर, काले धन के बैकुंठ में, बैठे भगवान् से, उनका नाता नहीं है, तो काले धन के पीछे बैठे, उन भगवानो का नाम उजागर कर, काला धन वापस ला कर दिखाए | अन्यथा सम्पूर्ण विश्व मानव समाज, यह मान ले की काले धन के देवता, यही सत्ताधारी लोग है | अगर अबभी विश्व की जनता इस राह पर कोई ठोस कदम नहीं उठाती है, तो वह दिन जल्द आएगा, जब विश्व अर्थ का जो बचा हुआ 5% सफ़ेद धन है, वह भी उस ब्लैक होल में, समाहित हो जायेगा | मानव क्लोनिंग के जरिये ये सत्ताधारी लोग अमर हो जायेंगे, मानव की जगह स्वचालित रोबोट्स ले लेंगे, और अन्तरिक्ष में, स्काईलैब बना कर विश्व की सत्ता वहीँ से, संचालित करेंगे | मानव पूर्ण रूप से, इस तंत्र से, बाहर और गुलाम होगा | आज के शिक्षित युवा वर्ग को, यह समझना होगा की, इस विश्व को हम विकास की राह पर ले चले, या विनाश की राह पर ?

 

 

चन्दन है, इस विश्व की माटी, तपो भूमि हर ग्राम है |

हर बाला, देवी की प्रतिमा, बच्चा, बच्चा, राम है |