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विकास करने का हक़ प्रत्येक मनुष्य को है | समानता का अधिकार, आर्थिक समानता से, ही संभव है | जब तक प्रत्येक मानव शिक्षित नहीं होगा वह अपने अधिकार के ज्ञान से वंचित रहेगा | इसलिए प्रत्येक मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार होता है शिक्षा प्राप्त करना | प्राथमिक विद्यालय से विश्वविद्यालय तक निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था हो और किसान जो कि अन्नदाता है उसे उसके उत्पादन मूल्य का दुगना लाभ न्यूनतम प्राप्त हो क्योकि जीवन का आधार ही किसान है विचारणीय है कि आज विश्व मानव के किसी भी वर्ग या तबके में, विकास दिखाई नहीं देता, क्योंकि परिश्रमिक के रूप में, जो दिया जाता रहा है, वह महज भीख है, अधिकार नहीं | और जबतक मानव अर्थ के अधिकार से, वंचित है, विकास असंभव है | विकास तभी संभव है, जब प्रत्येक मनुष्य को उसका आर्थिक हक़ मिले | अब प्रश्न उठता है, की आखिर आर्थिक हक़ है, क्या ? किसी भी संस्थान को एक रूपया भी, अगर मुनाफा होता है, तो उसमे श्रम करने वाले श्रमिक, पूंजी लगाने वाले पूंजीपति, और व्यवस्था चलानेवाले व्यवस्थापक (सरकार), का हक़ होता है | आजतक विश्व भर में, जो एक रूपया मूल मुनाफा होता आया है, उसे पूंजीपति और सरकार आपस में, बाँट लेते है | और श्रमिक को वेतन के रूप में, महज भीख दी जाती है | जिससे उनका विकास संभव नहीं हो सकता | अब प्रश्न उठता है, श्रमिक का विकास कैसे संभव हो ? विश्व अर्थव्यवस्था में, एक गलत अवधारणा है, की पैसा से, पैसा बनता है, जबकि बगैर मानव के श्रम से, एक रूपए की भी उत्पत्ति नहीं हो सकती | तो एक रूपया जो, मूल मुनाफा होता है, उसमे पहला हक़ श्रमिको का होता है | वेतन भले ही पद के हिसाब से, दिया जाय, लेकिन लाभांश में, सबों का हक़, सामान होना चाहिए | जो मूल मुनाफा एक रूपया होता है, उसका बंटवारा इस प्रकार होना चाहिए, 40 पैसा श्रमिको का, 30 पैसा पूंजीपतियों का, और 30 पैसा सरकार का, होना चाहिए | श्रमिको को जो 40 पैसा मिले, उसका सामान रूप से, श्रमिको में, बंटवारा हो | चाहे वह संसथान सरकारी हो या गैर सरकारी, इससे समाज के हर तबके को, विकास करने का सामान रूप से, अवसर प्रदान होगा | इसका एक दूरगामी परिणाम होगा, विश्व भर मैं आर्थिक क्रांति आ जाएगी, और उत्पादन कई गुना बढ़ जायेगा, गरीब, गरीब नहीं रहेगा और आमिर, और आमिर हो जाएँगे | क्योंकि जो पैसा श्रमिको को मिलेगा, उससे वह अपनी भौतिक सुख, सुविधाएँ, जिससे की, वह वंचित रह जाता है, उसकी वह पूर्ति करेगा, और पैसा पुनः बाज़ार को प्राप्त होगा | जिससे समाज के हर तबके में, विकास की, किरण अपने आप पहुँच जाएगी | समानता का नारा जो, आज तक विश्व भर में, लोग लगाते आयें हैं, वह सपना साकार होगा | आज विश्व भर में, आर्थिक मंदी, शब्द का उद्घोष हो रहा है | पर जरा गौर से, सोचे, और आखें खोल कर देखे तो, पाएंगे की इस विश्व आर्थिक मंदी में, तमाम सामान्य व मझौले व्यवसायी ख़त्म हो गए, उनका नामो निशान मिट गया, वो रास्ते पर आगये | बहुत मेहनत से, पीढी दर पीढी विकास कर, जो मनुष्य खुशहाली के स्तर तक पहुंचा था, वह सम्पूर्ण रूप से, बर्बाद हो गया | इसके ठीक विपरीत व्यवसाय के उच्च वर्ग पे, इस आर्थिक मंदी का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं दिखाई दिया | इसका एक ही अर्थ निकलता है, बड़े व्यवसायी और सत्ताशाहों ने मिल कर, आर्थिक मंदी का प्रपंच गढ़कर सामान्य और मझौले स्तर के व्यवसायिओं के उपर मढ़ दिया | जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है | आज विश्व आर्थिक मंदी से, जूझ रहा है, और लोग आत्महत्या करने को मजबूर हैं | लोग सही दिशा की जगह, गलत दिशा की और अग्रसर हो रहे हैं | जिसका एक गंभीर दुष्परिणाम सामने दिखाई दे रहा है | समाज के हर तबके में, आक्रोश दिखाई दे रहा है | मानव, मानव न हो कर मानव, पशु के रूप में, परिवर्तित हो रहा है | मानव का वास्तविक विकास, रचनात्मक रूप में, ही सर्वोत्तम होता है | इसका उदाहरण विश्व के एक छोटे से, भू-भाग जापान के रूप में, पूरा विश्व देख रहा है | एक छोटा सा देश, बगैर कोई विद्ध्वंशक हथियार, बनाये, सिर्फ अपनी तकनीकी गुणवत्ता और रचनात्मक क्षमता के कारण, आर्थिक दृष्टिकोण से, विश्व की आर्थिक व्यवस्था में, दूसरा स्थान रखता है | परंतु पूरा विश्व एक छोटे से, देश, जापान से, शिक्षा न ले कर, बारूद बनाने की और द्रुतगति से, सदियों से, लगा हुआ है | सत्तावर्ग विकास की जगह, विनाश की राह पर, विश्वव्यवस्था को चलने पर, मजबूर करता आया है | आखिर मनुष्य को विकास चाहिए, या विनाश ?

 

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